Dr. Pawan Kudwan
यद्यपि दून और सल्तनत काल में ‘दिल्ली अभी दूर’ है में वास करते हुए पहाड़ एवं पहाड़ीवास पर शाब्दिक विमर्श मार्मिक भाव तो पैदा करता है किंतु लोग भरोसा नहीं करते हैं…और करेंगे भी क्यों? आखिर जमीनी विमर्श तो पहाड़ के जटिल जीवन की माटी से ही स्वीकार्य होता है…
औपनिवेशिक शाही इतिहास से आगे गाँव की ओर चलते-चलते यह गौरव तो होता है कि हमारी अगलाड़/ यमुना घाटी अर्थात जौनपुरी लोक संस्कृति से अंग्रेज भी परिचित तो थे, इंग्लैण्ड में जौनपुरी लोक संस्कृति की बोली भाषा के शब्द जरूर अंग्रेज घर लौटते समय ले गए होंगे…देवलसारी एवं जौनपुर की सबसे ऊंची चोंटी ‘नाग टिब्बा’ उनके शिकार खेलने एवं ट्रैकिंग रूट हुआ करते थे. फेडी गाँव का उल्लेख तो हर्षिल के राजा फैड्रिक विल्सन ‘पहाड़ी विल्सन’ ने भी अपने ठहराव स्थल के रूप में किया है.
(आइए थोड़ी गांव की बग्वाल का जिक्र करते हैं…)
आर्थिक समृद्धि का त्यौहारी प्रोटोकॉल ‘बाजारवाद’ शहरी सभ्यता में आधुनिकता तो देती है किंतु प्राकृतिक अर्थात स्वाभाविक जीवनशैली की स्वछंदता एवं स्वतंत्रता गाँव की आत्मीयता में ही महसूस होती है.
शहरी औपचारिकताओं एवं आर्थिक शान की चमक से अपने घर गाँव के आँगन में लौटा हूँ… दिखावटी औचारिकताओं में जकड़न दिखती है…शहरी मिठास भले खूब है किंतु पारम्परिक स्वाँलें, पकोड़ों में आत्मीयता की स्वाधीनता की अनुभूति तो गाँव में ही होती है, जिसमें स्वछंदता बहुत निकट दिखती है. खुला आसमान एवं जल, जंगल, जमीन के खुशनुमा अंदाज में प्राकृतिक वास में स्वागत…
यद्यपि दून और सल्तनत काल में ‘दिल्ली अभी दूर’ है में वास करते हुए पहाड़ एवं पहाड़ीवास पर शाब्दिक विमर्श मार्मिक भाव तो पैदा करता है किंतु लोग भरोसा नहीं करते हैं…और करेंगे भी क्यों? आखिर जमीनी विमर्श तो पहाड़ के जटिल जीवन की माटी से ही स्वीकार्य होता है…
दून से जब भी मैं मसूरी होते हुए गाँव की ओर आता हूँ मुझे मंसूरी का कलोनियल पीरियड अर्थात औपनिवेशिक काल के साथ उपनिवेशवाद में मसूरी में मजबूती से खड़ें भवनों की नींव भी खूब दिखती है.
मलिंगगार में कैप्टन फैड्रिक यंग द्वारा बनायी पहली कोठी ने मंसूरी की नींव डाली. तब का सिस्टर बाजार आज के लण्डौर बाजार की बहुमंजिली इमारतें दो सौ सालों के बाद भी मजबूती से खड़ी है..गलोगी पॉवर हाऊस में लंदन से लाई टरबाइन मशीनों का ऐतिहासिक उजाला आज भी साक्षी है. जड़ीपानी रोड़ मसूरी की शुरूवाती विकास की कहानी में आज भी जीवंत हैं. 1823 -28 ई.की बीच मसूरी की औपनिवेशिक बसावटी सामान इसी रोड़ से मलिंगगार पहुँचता था…अंग्रेजों के महलों में दुधिया रोशनी एवं आलीशान ऐश्वरीय जीवनशैली में साम्राज्यवादी विस्तार में हमारी दासता/गुलामी की स्पष्टता में खड़ें ऊँचे घण्टाघर तब का समय आज भी बताते है…
लार्ड डलहौजी कतई मंसूरी में अंग्रेजी बसावट के लिए तैयार नहीं थे किंतु कैप्टन यंग यहाँ की प्राकृतिक सौन्दर्यता एवं जलवायु को आत्मीय रूप में आत्मसात कर चुके थे. फलतः जो मंसूरी आज दिखता है वह कैप्टन यंग की जिद्दी औपनिवेशिक विरासत की देन है. जो पर्यटनीय आर्थिक समृद्धि में अर्थव्यवस्था को आधार देती है. 1857 ई.की क्रांति में यह प्राकृतिक वास अंग्रेजों को पूरी सुरक्षा देता था…कृपा रियासती महाराज से भी प्राप्त थी.
‘द माल रोड’ अंग्रेजी शान की धरोहर थी, भारतीय तब इस रोड़ में नहीं घूम सकते थे. लेकिन यह शाही शान आज भी दिखती है. मैं वाहन के साथ इसमें प्रवेश करना चाहता था किंतु शुल्क का प्रावधान संभवतः कलोनियल नगरी के सौन्दर्य संरक्षण हेतु है..अदा करने के बाद प्रवेश मिला…खुशनुमा-एहसास तो ‘द माल’ में आज भी होता है.
औपनिवेशिक शाही इतिहास से आगे गाँव की ओर चलते-चलते यह गौरव तो होता है कि हमारी अगलाड़/ यमुना घाटी अर्थात जौनपुरी लोक संस्कृति से अंग्रेज भी परिचित तो थे, इंग्लैण्ड में जौनपुरी लोक संस्कृति की बोली भाषा के शब्द जरूर अंग्रेज घर लौटते समय ले गए होंगे…देवलसारी एवं जौनपुर की सबसे ऊंची चोंटी ‘नाग टिब्बा’ उनके शिकार खेलने एवं ट्रैकिंग रूट हुआ करते थे. फेडी गाँव का उल्लेख तो हर्षिल के राजा फैड्रिक विल्सन ‘पहाड़ी विल्सन’ ने भी अपने ठहराव स्थल के रूप में किया है.
सुवाखोली से जैसे ही जौनपुरी लोक संस्कृति अर्थात अगलाड़ नदी घाटी पर विकसित जौनपुरी संस्कृति सभ्यता दिखती है तो पारम्परिक रीति-रिवाज, खान-पान, बोली-भाषा के साथ प्राकृतिक बाँझ बुराँस के जंगलों की सम्पन्नता भी खूब महसूस होती है.
पनीर गाँव रौतू की बेली में आर्थिक समृद्धि एवं ग्रामीण भारत की आर्थिक पारम्परिक खुशहाली में पर्यावरणीय सम्पन्नता दिखती है. सड़क अधिक चौड़ी नहीं किंतु ‘सेफ एण्ड साउण्ड’ का यह पूरा भरोसा देती है. लैण्ड स्लाडिंग जैसी दुर्घटना इस सड़क पर नहीं होती है. मौरियाणा का ङाण्डा स्थानीय आर्थिकी के साथ उत्तरकाशी जनपद की सीमा रेखा में बाराहाट के थौलू (मेला) का उल्लास भी करवाता है..
(आइए थोड़ी गांव की बग्वाल का जिक्र करते हैं…)
गाँव की बग्वाल के खोले आंगन तो तीन दशक पहले की चहल पहल का भाव देते हैं. छिल्कें, छेंती, भैलू का उजाला भी देते हैं ढोल दमाऊं में औजी का आंगन चौक एवं सामंती ठसक भी बताते है… किंतु शहरी शान के इतने निकट गांव में भी पलायन का असर तो दिखता है. देहरादून के आलीशान घरों के पटाखों की आवाज़ तो यहां सुनाई देती है किंतु यह स्पष्ट कहती है कि हम अब दूनवासी है. हम दून से ही गाँव की माटी को याद करेंगे.
आर्थिक खुशहाली में गाँवों का पलायनी स्वरूप बदला है. लगातार तीन-चार सालों से मैं पटाखों की गूँज को गायब होते देख रहा हूँ. ऐसा नहीं की हम पटाखों के विस्फोटक स्वभाव में हमनें अपना स्वभाव बदला हो. अर्थात हम इक्को फ्रैंडली दीवाली में आये हो.. किंतु सच्चाई यह है कि शहरी शान में हम गाँवों से दूर फिलाल होते जा रहे हैँ…घर गाँवों के आँगन अपनों को बुलाते तो है लेकिन वक्त, वक्त की बात है आज नहीं तो कल अपना बचपन टटोलेंगे…लोग आयेंगे…क्योंकि दुनिया में ऐसा स्थान और कहीं नहीं जहां हम अपना संघर्षी अभावपन वाला जटिल जीवन स्मरण कर सके…जीवन की खैरि एवं उमंग उत्साह के संस्मरणों, विरासतीय यादों के जीवन आधार है गाँव के खाली खोलें…
हैप्पी बग्वाल गाँव की माटी से.
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है।








