Sunday, September 13, 2026
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आतिथ्य सत्कार की जीती जागती तस्वीर है सौंदाड़ी गांव की गीता बिष्ट।

By – Prem Pancholi

 

गीता बिष्ट, अरविंद रावत और रौतेला ढाबा द्वारा दिया गया आतिथ्य सत्कार मेरे साथी कभी भूल नहीं पाएंगे। ऐसा उन्होंने मुझे कहा है। इस कहानी को पूरा पढ़े और आप भी आतिथ्य सत्कार का रसस्वादन लें।

जब आप यमुना घाटी (रवाँई, जौनपुर, जौनसार बावर) में होते है तो आपको आतिथ्य सत्कार की भावना सामने से दिखाई देगी। मै यमुनोत्री कपाट खुलने के बाद सीधे पुरोला पहुंच गया था यानि 20 अप्रैल को। मेरे छोटे भाई अनिल ने कहा कि भाईजी आप कई समय से घर नहीं आए। सो मै पहुंच गया। अगले दिन मुझे देहरादून आना था। सुबह सुबह “न्यूज डिबेट” यूट्यूब चैनल पर पंडित राजेंद्र प्रसाद सेमवाल का जो मैने पॉडकास्ट किया था वह ब्रॉडकास्ट हो गया। मुझे लोगो के फोन आ गए। मैने भी फटा फटा इस पॉडकास्ट की लिंक उन्हें भेज दी और उन्हें फोन किया। उन्होंने फोन प्राप्त करते ही पूछ डाला कि प्रेम जी कहां हो, मैने कहा मै पुरोला हूं। उन्होंने भी कहा कि वह भी पुरोला में ही है। फिर क्या था, मुझे तो यही चाहिए था। मैने भी कहा कि पंडित जी मुझे भी अपने साथ देहरादून ले चलना। उन्होंने कहा कि वे अभी खलाड़ी गांव “जागमाता” के दर्शन करने जा रहे है। उसके बाद गुंदियाट गांव देवता के दर्शन करने के बाद देहरादून के लिए रवाना होंगे। मैने कहा ठीक है, मै उन्हें पत्रकार जगमोहन पोखरियाल के कार्यालय कुमोला रोड मिलता हूं।

वे भी अपने देवी दर्शन के बाद दोपहर 12 बजे पुरोला पहुंच गए। मै भी उनकी गाड़ी में वहीं से सवार हो गया। गाड़ी के भीतर पंडित जी के अलावा सौंदाड़ी गांव निवासी गीता बिष्ट, उनका भाई राजू और पंडित जी बैठे थे। मै गीता बिष्ट और उनके भाई राजू को नहीं पहचानता था। मगर ये लोग मुझे DD uttarakhand पर चर्चित “गांव दर्शन” कार्यक्रम में देखते है। सो गीता बहन कह दिया कि आप वही हैं, मैने कहा हां मैं ही हूँ। बहुत बातचीत नहीं हुई पर इतने में हम सौंदाड़ी गांव पहुंच गए। पंडित जी उनसे विदा ले ही रहे थे। किंतु गीता बिष्ट कहां मानने वाली, वे जिद करने बैठ गई खाना खा कर ही जाना। उनकी भावना को देखकर पंडित जी ने कहा कि ठीक है। ड्राइवर ने गाड़ी किनारे करके वे सौंदाड़ी गांव की ओर बढ़े।

मैने कहा कि आप लोग जल्दी आ जाना, मै यहीं गाड़ी के पास ही हूं। क्योंकि मैने खाना घर से खा लिया है। इसे सुनकर गीता बिष्ट ने जो नाराजी दिखाई उसे यहां व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मगर यही कह सकता हूं कि हमारे इस क्षेत्र में इसी भावना में “आतिथ्य सत्कार” कूट कूटकर भरा है जैसे आज गीता बिष्ट ने स्पष्ट कर दिया। उनके चेहरे के भाव में दया, सम्मान और आतिथ्य स्पष्ट दिखाई दे रहा था। कौन भला जो इस तरह की भावनाओं को टाल दे। इसलिए मैं कुछ कहता, पर सीधे उनके घर की तरफ बढ़े। गीता बिष्ट ने जो आदर सत्कार अपने घर पर हम सभी का किया उसे मै कैसे भूल सकता हूँ।

हम बैठे और बातचीत कर ही रहे थे कि गीता बिष्ट ने भोजन परोस दिया। भोजन भी एकदम सात्विक। यहां भी मैने थोड़ा कहने की कोशिश की, कि मै बस थोड़ा रायता पी लूंगा क्योंकि मैने भोजन घर से किया है। गीता बिष्ट ने कहा प्रेम भाई आप इस वक्त कहां है, रवाँई घाटी में है आप, भूल गए क्या। यहां से कोई बिन भोजन नहीं जा सकता। वैसे भी आप हमारे क्षेत्र के सम्मानित चेहरे हो। आज तक वे TV पर ही देखते थे। आज साक्षात् दर्शन हो गए तो यह और भी सम्मान करने वाली बात है। गीता की जिद के कारण गीता द्वारा बनाए गए पकवान का रसस्वादन लिया। सच में मन तृप्त हो गया। भोजन की स्वादिष्टता में जो प्यार और भाव घुल रखे थे, वही इस घाटी की “आतिथ्य देवो भवः” परंपरा को पुष्ट कर रही थी। यही नहीं इस क्षेत्र की परंपरा अनुसार मेहमानों पर टिक्का पिठाई भी हुई, जिसमें मेहमान के प्रथम बार घर आने पर टिक्का पिठाई के साथ साथ कुछ धनराशि भी प्राप्त करनी पड़ती है। वरना आतिथ्य सत्कार अधूरा माना जाता है।

गीता बिष्ट जी आप जैसे लोगों ने इस परंपरा को जीवित रखा हुआ है। वरना वैश्वीकरण के दौर में लोगों के पास कहां इस तरह के भाव दिखते है। सच में गीता बिष्ट के इस आतिथ्य सत्कार को मै ताउम्र नहीं भूल सकता हूँ। बस यही कह सकता हूँ कि एक बार हमारी यमुना घाटी में अवश्य आइए। यहां से जो “विनम्र भाव” आपके साथ जाएंगे वह सदा सदा के लिए यादगार बन जाएंगे।

 

इससे पहले भी ऐसा ही कुछ हुआ। यमुनोत्री से आकाशवाणी के लिए सजीव प्रसारण करने के पश्चात हम रात्रि विश्राम जानकीचट्टी में अरविंद एनेक्सी में कर रहे थे। दूसरे दिन हमने अरविंद एनेक्सी के मालिक अरविंद रावत को कहा कि वे उनका बिल बना दें, आज वे वापस देहरादून जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जाइए। मेरे साथ आकाशवाणी के जो लोग थे उन्होंने कहा कि प्रेम जी ये क्या कह रहे है। मैने कहा कि यही यहां का आतिथ्य सत्कार है। मगर हम सभी लोग सरकारी कार्य बावत यमुनोत्री में थे। मेरे साथियों ने अपने अनुसार इनके होटल वाले क्यूआर कोड में गूगल पे कर दिया। जब हम आगे बढ़ते है तो बहुत सारे लोगों से मिलने पर यह आतिथ्य सत्कार मिलता रहा। अब रौतेला ढाबा नौगांव में पहुंचते है। जहां से मुझे अपने साथियों क्रमशः डॉ० सुनील शुक्ला, विक्रांत भाई से विदा लेनी है। क्योंकि मुझे पुरोला जाना है। मेरे साथियों को आगे देहरादून पहुंचना है। मैने ही तय किया कि रौतेला ढाबा में सभी साथ भोजन करेंगे। हमने रौतेला ढाबा में भोजन किया। जैसे मेरे साथी विक्रांत भुगतान करने काउंटर की तरफ गए तो ढाबा के मालिक श्री रौतेला जी ने कह दिया, क्या कर रहे हो। आप तो प्रेम के मेहमान हो तो मेहमान हो। साथी सुनील ने कहा कि अंकल जी वे सभी सरकारी कार्य से आए है, इसलिए। उन्होंने कह दिया कि चाहे किसी भी कार्य से आए हो इस घाटी में ऐसा नहीं चलता। यही तो यहां की पहचान है आतिथ्य देव भवः। अब मैंने नौगांव से अपने आकाशवाणी के साथियों से विदा ली। तब तक मेरा भाई अनिल जो इस क्षेत्र के जानेमाने लोक गायक है अपनी ड्यूटी से लौटकर नौगांव पहुंच गया था। उसकी गाड़ी में बैठकर मै इस तरह पुरोला पहुंच गया।

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