– हरीश रावत-यशपाल आर्य -प्रीतम सिंह क़ो पैदल करने की तैयारी!
– एक परिवार एक टिकट से बबाल होना तय.
By – Gajendra Rawat
उत्तराखंड कांग्रेस इन दिनों एक बार फिर अंदरूनी खींचतान और गुटबाज़ी के दौर से गुजर रही है, और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में खड़ी हैं कुमारी शैलजा। सवाल उठ रहा है—क्या संगठन को मजबूत करने आई प्रभारी खुद ही अनजाने में फूट की वजह बन गईं? उत्तराखंड आकर एक परिवार एक टिकट की बात करने वाली शैलजा कुमारी को अच्छी तरह मालूम है कि तीन बड़े नेताओं प्रीतम सिंह के भाई चमन सिंह सहसपुर से यशपाल आर्य के बेटे संजीव आर्य नैनीताल से हरीश रावत के बेटे आनंद रावत धर्मपुर और वीरेंद्र रावत खानपुर से तैयारी कर रहे हैं हरीश रावत के साले करण महारा रानीखेत से दो बार विधायक रह चुके हैं वह रानीखेत से स्वाभाविक रूप से दावेदार है.यह तैयारी उसे दौर में चल रही है जब कांग्रेस प्रत्याशियों के संकट से जूझ रही है. शैलजा कुमारी के इस बयान के बाद कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े तेज हो गए हैं कि जब सोनिया गांधी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तीनों संसद में बैठे हैं तो बाकी राजनीतिक परिवार के लोग एक परिवार एक टिकट क्यों स्वीकार करें?भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नया विषय नहीं है, लेकिन जब बात सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे नेताओं की आती है, तो यह बहस और भी तीखी हो जाती है। सवाल सीधा है—अगर गांधी परिवार के ये सदस्य चुनाव लड़ सकते हैं, तो कांग्रेस के अन्य राजनीतिक परिवारों को क्यों पीछे रखा जाता है?
कांग्रेस पार्टी लंबे समय से “समावेशी राजनीति” की बात करती रही है, लेकिन व्यवहार में अक्सर नेतृत्व का केंद्र एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत ऐतिहासिक है—इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की विरासत ने इस परिवार को राष्ट्रीय पहचान दी। लेकिन लोकतंत्र केवल विरासत पर नहीं, अवसर की समानता पर भी टिकता है।
बाकी परिवारों के लिए अलग पैमाना
कांग्रेस में कई ऐसे नेता हैं जिनके परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय रहे हैं—चाहे वह क्षेत्रीय स्तर पर हों या राष्ट्रीय स्तर पर। लेकिन जब उनके बच्चों या रिश्तेदारों को टिकट देने की बात आती है, तो “योग्यता” और “संघर्ष” की कसौटी अचानक सख्त हो जाती है। सवाल उठता है—क्या यह कसौटी गांधी परिवार पर भी समान रूप से लागू होती है?
संगठन बनाम व्यक्तिवाद
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती आज यही है कि वह संगठन आधारित पार्टी बने या व्यक्तित्व आधारित। जब पार्टी का चेहरा बार-बार एक ही परिवार से आता है, तो बाकी नेताओं में यह संदेश जाता है कि उनकी भूमिका सीमित है। इससे न केवल आंतरिक असंतोष बढ़ता है बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरता है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
लोकतंत्र में चुनाव लड़ना हर नागरिक का अधिकार है, और किसी भी राजनीतिक परिवार के सदस्य को इससे वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन असली सवाल “अधिकार” का नहीं, “समान अवसर” का है। अगर गांधी परिवार के सदस्य चुनाव मैदान में उतर सकते हैं, तो अन्य परिवारों को भी वही अवसर और मंच मिलना चाहिए—बिना किसी भेदभाव के।
कांग्रेस अगर वास्तव में खुद को पुनर्जीवित करना चाहती है, तो उसे “परिवारवाद” की छवि से बाहर निकलना होगा। गांधी परिवार का योगदान अपनी जगह है, लेकिन पार्टी का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब वह हर कार्यकर्ता और हर राजनीतिक परिवार को समान अवसर दे। वरना यह सवाल बार-बार उठता रहेगा—क्या कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है या एक परिवार की राजनीतिक विरासत? यह बहस केवल कांग्रेस की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की भी परीक्षा है।
नेतृत्व की मंशा या रणनीतिक चूक?
जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उत्तराखंड में नई ऊर्जा भरने के लिए कुमारी शैलजा को जिम्मेदारी सौंपी, तो उम्मीद थी कि वह गुटबाज़ी खत्म कर संगठन को एकजुट करेंगी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं को यह महसूस होने लगा है कि फैसले संतुलन की बजाय “पसंद-नापसंद” के आधार पर लिए जा रहे हैं।
पुराने बनाम नए चेहरों की लड़ाई
उत्तराखंड कांग्रेस में पहले से ही कई धड़े सक्रिय रहे हैं—एक तरफ पुराने दिग्गज, तो दूसरी ओर उभरते युवा नेता। शैलजा के कार्यकाल में इन दोनों के बीच की दूरी कम होने के बजाय और बढ़ती दिख रही है।
टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियों और बैठकों में प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
संवादहीनता बनी बड़ी वजह
राजनीति में संवाद सबसे बड़ा हथियार होता है, लेकिन यहां वही कमजोर कड़ी बनती नजर आ रही है। कई नेताओं का आरोप है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, और फैसले थोपे जा रहे हैं। जब नेतृत्व संवाद के बजाय निर्देश देने लगे, तो संगठन में दरार पड़ना तय हो जाता है।
भाजपा को मिल रहा फायदा
इस आंतरिक कलह का सीधा फायदा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को मिल रहा है। जहां एक तरफ भाजपा संगठित होकर चुनावी रणनीति बना रही है, वहीं कांग्रेस अपने ही घर को संभालने में उलझी हुई है।
यह स्थिति आने वाले चुनावों में कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
अगर कांग्रेस को उत्तराखंड में अपनी खोई जमीन वापस पानी है, तो सबसे पहले उसे अंदरूनी एकता पर ध्यान देना होगा। कुमारी शैलजा को भी यह समझना होगा कि संगठन को चलाना केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से संभव होता है।
उत्तराखंड कांग्रेस की मौजूदा स्थिति यह संकेत दे रही है कि नेतृत्व की छोटी-छोटी चूक भी बड़े राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है।
अब देखना यह है कि कुमारी शैलजा इस फूट को पाटने में सफल होती हैं या यह दरार आने वाले चुनावों में कांग्रेस की हार की वजह बनती है।
राजनीति में एकता ही ताकत होती है—और फिलहाल उत्तराखंड कांग्रेस इसी सबसे बड़ी ताकत से दूर नजर आ रही है।
कुल मिलाकर जिन शैलजा कुमारी से उत्तराखंड प्रदेश कार्यकारिणी नहीं बन पा रही उनका उत्तराखंड आकर एक परिवार एक टिकट का यह बयान उत्तराखंड कांग्रेस के बड़े नेताओं मे कलह का रास्ता खोल गया है.







