Thursday, May 14, 2026
Home entertainment यात्रा संस्मरण : बाई रोड और बिना हेलमेट की सवारियां।

यात्रा संस्मरण : बाई रोड और बिना हेलमेट की सवारियां।

By – Smita karnatak

लालबाग के बाद इंदौर के ह्रदय स्थल पर राजावाड़ा तो जाना ही था. सात मंजिला इस भव्य महल की वास्तुकला में मराठा, मुग़ल और यूरोपियन शैली का सुंदर मिश्रण है.

18वीं सदी में मल्हार राव होल्कर ने इसका निर्माण शुरु करवाया जिसे बाद में रानी अहिल्याबाई ने पूरा किया. कभी यह होल्कर राजवंश का निवास था, अब इसका एक भाग संग्रहालय है जो देखने लायक है.

सामने ही सड़क पार थोड़ी दूरी पर अंतिम संस्कार पूरा करने का स्थल है. पहली बार देखने पर वह जगह भी मंदिर जैसी ही दिखती है.

इंदौर का सारा दिन यही सब देखते गुजर गया. माँ बेटे कहीं भी सबसे अधिक समय संग्रहालय देखने में बिता देते हैं, खाना – पीना तो उसके बीच में होता रहता है. रानी अहिल्याबाई ने लोक कल्याण के कितने काम किये यह संग्रहालय जाकर पता चलता है. छोटे उद्योगों को उन्होंने ख़ूब प्रोत्साहित किया जिसमें से एक महेश्वर नगर के नाम से माहेश्वरी साड़ियाँ प्रसिद्ध हैं.


हर तरह की कला चाहे वह मूर्तिकला हो या अन्य कारीगरी, उनके समय में खूब फली फूली.

जिस कालखंड में रानियाँ भी पर्दे के पीछे रहा करती हों उस समय कम उम्र में पति के देहांत के बाद एक रानी का राज्य की हर व्यवस्था को पूरी कुशलता से चलाना अपनेआप में मायने रखता है.

राजवाड़ा के पास ही सर्राफ़ा बाज़ार है जो दिन में सोने चाँदी सा चमकता है तो रात को स्ट्रीट फूड प्रेमी इंदौरियों की चहल पहल से गुलज़ार रहता है. इंदौर अपने स्ट्रीट फूड के लिये प्रसिद्ध है, वो भी रात में लेकिन हम सुबह जल्दी अपने अगले पड़ाव के लिये निकल लेते हैं इसलिए रात कहीं भी ग्यारह बजे के बाद बाहर डोलते नहीं फिरे. रास्ते में जहाँ कहीं उस जगह का ख़ास व्यंजन खाने को मिला उसे छोड़ा भी नहीं.

एक बात जिसपर हमारा ध्यान जाना ही था वो ये कि हल्द्वानी से निकलने के बाद से ग्वालियर हो या उज्जैन और अब इंदौर, दुपहिया वाहनों पर हेलमेट का इस्तेमाल करते कोई इक्का दुक्का लोग ही दिखे. हल्द्वानी में तो पीछे की सवारी के लिये भी अनिवार्य है और वहाँ हाई वे पर भी लोग आराम से तीन सवारियों के साथ बिना हेलमेट के फ़र्राटा मारते हुए गुज़र जाते हैं.

इस तरह दो दिन साफ़ सुथरे, हरे – भरे इंदौर के गली कूचे नापते हुए हम तीसरी सुबह इंदौरी पोहा खाकर अजंता की प्रसिद्ध गुफाएँ देखने आगे चल दिये.

कहीं एक साइन बोर्ड पढ़ा — गति पर ब्रेक, नहीं तो हड्डी क्रेक.

हेलमेट पहनने के बारे में कोई बात कहीं नहीं थी.

@लेखिका साहित्यकार है।

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