Sunday, September 13, 2026
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सावन में भेड़ों की वापसी पर मनाया जाने वाला लोक पर्व — “नुणाई”

सावन में भेड़ों की वापसी पर मनाया जाने वाला लोक पर्व — “नुणाई”

By – Dr. Leela Chauhan

हर वर्ष सावन महीने में खत बौन्दुर, जौनसार क्षेत्र में मनाया जाने वाला लोकपर्व “नुणाई” पशुपालन पर आधारित हमारे समाज की गहराई से जुड़ी मान्यताओं और संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व दर्शाता है कि हमारा समाज पशु केवल जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि भावनात्मक लगाव था। भेड़ें हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। उनसे प्राप्त ऊन से हमारे घरों के बिस्तर, गर्म वस्त्र, और अन्य आवश्यक वस्तुएं बनाई जाती थीं।

प्रवास व्यवस्था

बिस्सू त्यौहार (अप्रैल) के बाद, खत के सभी गांवों की हजारों भेड़ें ऊँचे पहाड़ों की ओर प्रवास के लिए रवाना की जाती थीं। उनका कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता था। दिन में वे घास चरतीं और रात किसी थात (मैदान) में विश्राम करतीं। जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए उनके साथ विशेष रूप से प्रशिक्षित कुत्ते और चार–पांच चरवाहे होते थे।
चरवाहे बारी-बारी से गांव लौटते और “शमण” (खाने की सामग्री) लेकर जाते थे। इस तरह 3–4 महीने का प्रवास पूरा होता।

सावन में वापसी और उत्सव का आरंभ:

सावन के आते ही जब भेड़ें वापस गांव लौटती थीं, तो चरवाहों का पूरे खत में उनका स्वागत पर्व जैसा होता था। गांव-गांव में उनके लिए विशेष पकवान बनाए जाते – पूरी, मांस, मछली आदि। यह स्वागत लगभग 20 दिनों तक चलता। इस अवधि में भेड़ें गांव के आसपास के जंगलों में चरती थीं।

नुणाई पर्व की परंपरा:

4 अगस्त को सभी भेड़ों को एक साथ नहलाया जाता, इस दिन को “नणेन्ढ” कहा जाता है।
5 अगस्त को उन्हें “मानथात” ले जाया जाता, जहाँ उन्हें नमक खिलाया जाता – इसी परंपरा के कारण यह पर्व “नुणाई” कहलाता है। इस दिन गांववासी विशेष रूप से “शेरवा” (आटे की मोटी, मीठी रोटी) बनाते, जिसे प्रसाद के रूप में चरवाहों और उपस्थित लोगों में वितरित किया जाता। चरवाहे भेड़ों की ऊन से बने परिधान पहनकर नाचते-गाते थे। उनके झोलों में रखे शेरवा को वे महिलाओं और बच्चों में बांटते थे। अंतिम आयोजन लवारा मेला
रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह भेड़ें ओज (अलग-अलग) की जाती थीं और अपने-अपने मालिकों को सौंप दी जाती थीं। इसके बाद दिन में एक विशाल मेला आयोजित होता था, जिसे “लवारा” कहा जाता है।

नुणाई जैसे पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी विरासत, आजीविका, पर्यावरण से जुड़ी चेतना और सामूहिक सहयोग का प्रतीक हैं।

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