सावन में भेड़ों की वापसी पर मनाया जाने वाला लोक पर्व — “नुणाई”
By – Dr. Leela Chauhan
हर वर्ष सावन महीने में खत बौन्दुर, जौनसार क्षेत्र में मनाया जाने वाला लोकपर्व “नुणाई” पशुपालन पर आधारित हमारे समाज की गहराई से जुड़ी मान्यताओं और संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व दर्शाता है कि हमारा समाज पशु केवल जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि भावनात्मक लगाव था। भेड़ें हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। उनसे प्राप्त ऊन से हमारे घरों के बिस्तर, गर्म वस्त्र, और अन्य आवश्यक वस्तुएं बनाई जाती थीं।

प्रवास व्यवस्था
बिस्सू त्यौहार (अप्रैल) के बाद, खत के सभी गांवों की हजारों भेड़ें ऊँचे पहाड़ों की ओर प्रवास के लिए रवाना की जाती थीं। उनका कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता था। दिन में वे घास चरतीं और रात किसी थात (मैदान) में विश्राम करतीं। जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए उनके साथ विशेष रूप से प्रशिक्षित कुत्ते और चार–पांच चरवाहे होते थे।
चरवाहे बारी-बारी से गांव लौटते और “शमण” (खाने की सामग्री) लेकर जाते थे। इस तरह 3–4 महीने का प्रवास पूरा होता।

सावन में वापसी और उत्सव का आरंभ:
सावन के आते ही जब भेड़ें वापस गांव लौटती थीं, तो चरवाहों का पूरे खत में उनका स्वागत पर्व जैसा होता था। गांव-गांव में उनके लिए विशेष पकवान बनाए जाते – पूरी, मांस, मछली आदि। यह स्वागत लगभग 20 दिनों तक चलता। इस अवधि में भेड़ें गांव के आसपास के जंगलों में चरती थीं।








