Sunday, June 28, 2026
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जब ‘आछरी’ गांव की प्रधान बन गई

जब आछरी गांव की प्रधान बन गई

Aachhari by Madamnohan duklan
Aachhari by Madamnohan duklan

पिछले छः माह में देहरादून के विभिन्न स्थानों पर लगभग एक दर्जन नाटक खेले गए है। लगता है कि नाट्य की यह बहुत पुरानी परंपरा देहरादून में लौट के आ रही है। फरवरी माह के प्रथम सप्ताह में प्रसिद्ध नाट्य संस्था “कला दर्पण” ने “आछरी” नाटक की सफल प्रस्तुति डा० सुवर्ण रावत के निर्देशन में प्रस्तुत कर फिर से नगर निगम के जुगुमूंदर प्रेक्ष्यागृह को आबाद कर दिया है।

दरअसल आछरी नाम पहाड़ से निकला हुआ है, जो सिर्फ व सिर्फ पहाड़ यानी उत्तराखंड में ही प्रयोग किया जाता है। आछरी का तात्पर्य वनदेवी अथवा सुंदरता से है। सुंदरता का संबध मन, मस्तिष्क व कुशल व्यवहार से यहां माना जाता है। नाटक भी यही बताने का प्रयास करता है। यह नाटक प्रसिद्ध साहित्यकार डा० हरिसुमन बिष्ट के उपन्यास “आछरी-मात्री” के मूल से लिया गया है। जिसे “आछरी” नाम से रूपांतरित किया गया है। जब नाम पहाड़ी है तो कहानी भी पहाड़ी पृष्ट भूमि की ही होगी।

Aachhari by Madamnohan duklan
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यह जगजाहिर है कि समस्त भारत में महिलाओं की भूमिका और उनके साथ होने वाले व्यवहार- दुर्व्यवहार की समस्या कमोवेश एक जैसे ही है। उत्तराखंड हिमालय की “आछरी” भी उन महिलाओं में से एक है जिसने ताउम्र कष्टों से सामना किया है। अकेली महिला, एक बेटा और भरी पड़ी जिंदगी में उसने क्या क्या सहन नहीं किया हो, जिसे नाटक में बखूबी दिखाया गया है। लेखक की कुशलता का कमाल है कि जिस आछरी को कभी समाज दुत्कारता था वह सफलता की मिशाल बनी है। इसलिए कि ग्रामीण समाज ने आछरी को चुनाव में जीतवा कर गांव का प्रधान बना दिया है। प्रतिद्वंदी के रूप में आए गांव के रौबदार “तुलसा” नाम का शख्स लाख विरोध करने के बावजूद भी वह अंततः आछरी के व्यवहार और कुशलता का कायल जो बन गया। नाटक में सबसे आकर्षक मोड़ तब आता है जब तुलसा एक तरफ चुनाव जीतना चाहता है, दूसरी तरफ आछरी से नाता नहीं तोड़ना चाहता और परिवार की कलह बनी आछरी के द्वेष को अपनी पत्नी के सामने मिटाना चाहता है। यहां पर अभिनय कर रहे कलाकारों ने अद्भुत अभिनय का परिचय दिया है। थोड़ी देर के लिए सही, पर एक बारगी सोचने के लिए दर्शक विवश हो गए।

Aachhari by Madamnohan duklan
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नाटक में कई ऐसे संवाद आए कि दर्शक कभी रोए, कभी हंसे और कभी अपने से सवाल करने लगे। मगर नाटक ने अपने 90 मिनट के अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।

खचाखच भरे नगर निगम देहरादून के प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक नाटक समाप्त होने पर भी बैठे रहे है। समापन के बाद भी दर्शक आपस में यह ऊहा- पोह में चर्चा करते रहे कि लेखक की कल्पना कितनी सारगर्भित है? कि जिस महिला को समाज ने तरह तरह के ताने दिए उसने चुनाव में हाथ आजमा दिया। यही नहीं नाटक में जुनजुन्याली और मोहना का प्रेम भी सुर्खियों में रहा। क्योंकि इन दोनो को भी गांव के रसूखदार और अपने को नामी कहने वाले लोग यानी “तुलसा” का कुनबा पसंद नहीं करते थे। जुनजुन्यली आछरी की बेटी है और मोहना गांव के पशुचारको के परिवार से आता है। यानी जाति समुदाय का भी अंतर है। फिर भी आछरी ने इन सभी संकीर्ण बाधाओं को तोड़ा है,  मोहना और जुनजुन्याली के प्रेम को सहज स्वीकारा है।बाहरहाल यह सीन थोड़े देर के लिए ही प्रस्तुत हुई है, किंतु अभिनय, संवाद और समाज में फैले “वाद” को झकझोरने का सफल प्रयास किया है।

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नाटक में कई उतार चढ़ाव देखे गए। सभी कलाकार मंझे हुए थे, परंतु कहीं कही निर्देशन का अभाव दिख रहा था। कई बार कथानक समन्वय नही बना पा रहा था, पर कलाकारों के भावनात्मक अभिनय एवम डायलॉग डीलेबरी, एक्सप्रेशन ने दर्शकों को बांधे रखा है। कई बार ऐसा लग रहा था कि कथानक कहीं और आगे चला गया है, यानी बीच में कुछ छूट रहा है। अतः यही कहा जायेगा कि अभिनय की अद्भुत कारीगिरी ने संवाद तथा कलाकारों की भावभंगिमा ने दर्शकों को निर्देशिकीय कमी महसूस नहीं होने दिया।

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कुलमिलाकर नाटक में कलाकारों से लेकर निर्देशक तक ख्याति प्राप्त है। यह महसूस जरूर किया गया कि निर्देशक की समय की कंजूसी की वजह से नाटक अपने पूरे मिजाज में दर्शकों तक नही पहुंच पाया। जैसे लेखक के उपन्यास की कहानी बताती है। दिलचस्प यही है कि बिना किसी लावलस्कर और प्रॉपर्टी के यह नाटक अभिनय, संवाद व भाषाई शब्द विन्यास के फलस्वरूप दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ पाया है। अब ऐसा लग रहा है कि आने वाला समय फिर से देहरादून की नाटक परंपरा में आयेगा और पूर्व की भांति राष्ट्रीय सिनेमा को सींचने का कार्य करेगा।

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लब्बोलुआम यही है कि डा० हरिसुमान बिष्ट के बहुत लोक प्रिय उपन्यास आछरी-मात्री को गढ़वाली में अनुवाद वरिष्ठ साहित्यकार और उत्तराखंड सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता मदनमोहन डुकलान ने किया है। जबकि इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद “द सागा ऑफ ए मांऊटेन गर्ल” नाम से अंतर्राष्ट्रीय फलक के साहित्य जगत में अपनी दमदार उपस्थिति के साथ पढ़ा जा रहा है।

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आछरी का अभिनय सुषमा बर्थवाल, तुलसा मदनमोहन दुकलान, सहाब विजय गौड़, विशन सिंह, काका, बाघ का अभिनय दिनेश बौड़ाई, जयदत्त व शेरू धीरज सिंह रावत, चंद्रा भारती आनंद, गोधना वीरेंद्र असवाल, मोहना सुमित वेदवाल, जुनजुन्याली व दानू अनामिका, जयंती अंशिका सहित अन्य कलाकार सुरक्षा रावत, संतोष गैरोला, माधवेंद्र रावत, गायत्री रावत, आयुष्मान, मुस्कान, टी० के० अग्रवाल, श्रीवर्णा रावत, जयदेव भट्टाचार्य, अभिनव गोयल, मनीष कुमार, श्रेया मखलोगा, बीरेंद्र गुप्ता, प० उदय शंकर भट्ट कलाकार थे। जबकि गायन पक्ष में सतेंद्र परिदयाल व दीपा पंत ने समा बांधे रखा है।

Aachhari by Madamnohan duklan
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कथानक –
यह नाटक हिमालय क्षेत्र के उत्तराखंड संस्कृति पर आधारित है। हिमालय उत्तराखंड की “आछरी” नाम की एक पहाड़ी लड़की की गाथा है।जिसका संघर्ष अनुकरणीय है। डूंगरपुर गांव का प्रधान “तुलसा” भी उसे डगमगाने में असमर्थ रहा। आछरी सारी मुसीबत व चुनौतियों का सामना करती है। डूंगरपुर गांव के लोग “आछरी” को एक आदर्श के रूप में देखते हैं और “आछरी” उनकी मदद के लिए चट्टान की तरह खड़ी रहती है।

निर्देशक –
डॉक्टर सुवर्ण रावत का जन्म उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र में हुआ हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से परफॉर्मिंग आर्ट में मास्टर डिग्री प्राप्त है। फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट आफ इंडिया पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स किया है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय थिएटर इन एजुकेशन के संस्थापक सदस्य हैं। थिएटर में पीएचडी एवं शिक्षा के क्षेत्र में संस्कृति मंत्रालय से सीनियर रिसर्च फैलोशिप प्राप्त हैं। सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत लंदन यूके के अलावा वारसा, पोलैंड के अंतरराष्ट्रीय नाट्य समारोह में बतौर अभिनेता भागीदारी की है। कला दर्पण संस्था के संस्थापक है। रंगमंच के अलावा दूरदर्शन एवं फिल्मो में भी अभिनय किया है। रंगमंच एवं शिक्षा की विधा में योगदान के लिए मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला सम्मान से वे सम्मानित है।

 

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