Friday, September 11, 2026
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128 साल पुरानी है ठाणा डांडा बिस्सू गनियात की कहानी

Dr. Pawan Kudwan

1967 ई. में संवैधानिक जनजातीय पहचान जौनसार-बावर को प्राप्त हुई, किंतु जनजातीय मूल स्वरूप भौगोलिक एवं सामाजिक आधार अतीत से रहा. रीति-रिवाज एवं मेले पर्वों में यहां के लोक की लोक आत्मा बसती है. बिस्सू पर्व की धार्मिक एवं सामाजिक समरसता की नींव की अपनी यहां गहराई है. दुनिया के पर्यटनीय ऩक्शे पर आज इस स्थान की पहचान ‘चिरमिरी टॉप’ की है. किंतु अतीत की सांस्कृतिक इतिहास में ठाणा डांडा की जीवंतता है.निकटवर्ती ठाणा गाँव की छानियां यहां कभी हुआ करती थी. ठाणा डांडा बिस्सू गनियात जो बिल्कुल हमारे डिग्री कॉलेज चकराता के निकट है. मुझे 17 अप्रैल, 2026 को इसमें शामिल होने का अवसर मिला, फलतः जैसा मैंने देखा एवं समझा उसे प्राथमिक स्रोतों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ.

ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने चकराता को ‘पहाड़ों का राजा’ कहा, कारण यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता एवं अनुकूलित जलवायु. ठाणा डांडा से भी औपनिवेशिक इतिहास के किस्से जुड़ें है. लोक में मौखिक रूप में सुना जाता है कि अंग्रेज यहाँ हेलीपैड बनाना चाहते थे, किंतु स्थानीयता ने तब प्रतिरोध किया. यह भी लोक मान्यता हेै कि इस शानदार सपाट थात में वे निर्माण कार्य करना चाहते थे तब उन्होंने यहां तक घोड़ा मार्ग भी बना दिया था, जो आज भी मौजूद है. किंतु इसके नीचे झील अथवा पानी की संभावना होने के कारण उन्होंने अपने प्रोजेक्ट में बदलाव किया. यद्यपि लिखित संदर्भ स्रोत प्राप्त नहीं है. किंतु प्राथमिक स्रोतों से संदर्भित यह आधार है.
आइए अब बिस्सू पर्व की जनजातीय समाज में क्यों इतनी ऐतिहासिकता आधुनिक परिदृश्य में भी है. मूलतः यह पर्व कृषि की आर्थिक खुशहाली से जुड़ा है. पशुपालन एवं कृषि न केवल यहां बल्कि दुनिया की सभी आदिवासी क्षेत्रों की रीड़ रही है, जिस कारण जनजातीय लोक मानस के तीज़-त्यौहार भी प्रकृति के निकटता में हैं. सक्रांति से जौनसार-बावर की 39 खतों के गाँवों में गाँव-गाँवों में घर की लिपाई-पुताई यहाँ तक ऋतुओं के अनुरूप प्रवासी छानियों की भी, साथ ही यहां के आँगन चौरी के मंदिर में कुल देव महासू की पूजा अर्चना बुरांस के फूल एवं पारम्परिक व्यजंनों से की जाती है.

बिस्सू पर्व जौनसार बावर में बैसाखी के दिन अर्थात 13 अप्रैल 17 अप्रैल, चार -पाँच दिनों तक अलग-अलग खतों में अपनी सुविधानुसार लगता है. गांवों की भौगोलिक सपाट थात पर बिस्सू गनियात (मेला) लगता है. गनियात शब्द की प्राकृतिक ऐतिहासिकता का संदर्भ लोक में इस रूप में मिलता है. गानी का फूल एवं कोंपलें बीनने पूर्व समय में गाँव की बालिकाएं/युवतिया ऊँचे स्थानों पर जाया करती थी. यह औषधीय पौधा भी है. इन्हें बीनते-बीनते वे ऊँचें थातों (चोंटियों में) अलग-अलग गाँवों की बालिकाओं का आत्मीय भावनाओं के मेल मिलाप में एक मेला जैसा जमवाड़ा लग जाता था. इसी संकल्पना से फिर गनियात लोक में प्रचलित हुआ. स्थानीयता में इन स्थानों पर गनियात (मेले) लगते हैं, चौली थात, (अब रामताल गार्डन), चुरानी का बिस्सू, लुहन डांडा, जाखणी का बिस्सू, नगाय, चौलिक, खुरूड़ी, मागटी का डांडा, मकाबागी, लाखामण्डल मड़े के थौड़ें और ठाणे डांडे की गनियात जिसका ऐतिहासिक संदर्भ ठाणा गाँव के बीरेन्द्र जोशी जी एवं मेला समिति के उपाध्यक्ष सलिकराम जोशी जी ने सहिया में लगने वाले मौण मेले से बताया है.
इस गनियात में उपलगाँव खत एवं वनगाँव खत के गाँवों के सामूहिकवाद की एकता के अतीत के जश्न को मनाने का केन्द्र बिंदु रहा है, जो अब जौनसार-बावर की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त स्थल हो गया है.
वनगाँव खत (खत से अभिप्राय अन्यत्र क्षेत्रों में इन्हें पट्टियां कहा जाता है) में रावना, पाटी, बुरांस्वा, मयरावना, शिर्बा, मैपाऊटा, टुंगरौली, घणता, कोटुवा, कोल्हा, बिसाऊ आदि गाँवों की मोईल्ला (समूह) अपने पारम्परिक गाजे-बाजे, ढोल-दमाऊं, रणसिंगें आदि वाद्य यंत्रों के साथ ठाणा डांडा गनियात में पहुंचते हैं तो उपलगाँव खत के ठाणा, टुंगरा, रिखाड़, बिरमों, कोरबा आदि गाँवों के लोग भव्यता से उनका आत्मीय स्वागत सत्कार करते हैं. अपनी पारम्परिक परिधानों में पुरुष एवं महिलाओं की टोलियों का सौन्दर्य एवं मर्यादित शालीनता में जौनसार-बावर की सांस्कृतिक पहचान अति मनभावन लगती है. इसके बाद बिस्सू गनियात में पारम्परिक गीत तांदी, रांसू, झैंता एवं जंगू गीतों से जो आकर्षण बनता है, वह मौलिक संस्कृति की मूल आत्मा की साझी धरोहरीय विरासत लगती है. लोगों के हाथों में तलवार, डांगरी घेसड़ी (विशेष प्रकार का लकड़ी का डंडा,) से लोकनृत्य किया जाता है.
बिस्सू गनियातों में जितनी तांदी, हारूलें, राँसू, जंगा बाजी (युद्ध/शौर्य गीत) लगते हैं, वे सब जनजातीय जीवनशैली से जुड़ें मौखिक परम्परा की लोक आत्मा आधारित होते हैं, जिनमें हर्ष, उल्लास, श्रृंगार के साथ भौगोलिक एवं सामाजिक जटिलताओं के साथ दुःख, वेदना की भी पुकार होती. इन गीतों में प्रकृति संरक्षण एवं कृषि प्रधानता की भावना लोक कलाकारों की सृजनता मन से उकेरी रहती है.

ठोड़ें नृत्य (तीरंदाजी/धनुष बाण युद्ध) जो गनियात का एक प्रमुख केंद्र बिंदु है. यह पराक्रम एवं कौशल साहस का प्रतीक है. विभिन्न खतों से युवा एवं वृद्धजन पूरे उत्साह के साथ पैरों में मोटा ऊनी पाइजामा पहनकर आते हैं. ठोड़ा गीत एवं वाद्य यंत्रों पर ठोड़ा गीत के ताल ढोली बजाते हैँ, रणसिंगा जो शौर्य एवं युद्ध की गूंज का प्रतीक है, गूंजता है और युवा ठोड़ा नृत्य करते हुए धनुष पर बाण चढ़ाते और गौरव के साथ अपने खानदान का परिचय देते हैं. फिर जोर से धनुष पर बाण खींचतें और दूसरे साथी जो पास में अपने दोनों पैरों को हिलाते रहते हैं पर जोर से तीर मारते हैं. निशाना पैरों पर ही लगाना होता है. ठीक फिर दूसरा साथी अपने धनुष बाण लेता और निशाना उसके पैरों पर लगाता है. इस बीच ठोऊड़ा गीत एवं ढोल की थाप के साथ वह साठी (कौरव पक्ष) या पासी (पांडव पक्ष) का यह कहता रहता है. कभी-कभी जोरदार तीर पैरों पर लगता है तो लोक में हंसी मजाक के रूप में कहा जाता है कि सावन के महिने रोपाई करते समय यदि पैरों में दर्द होता है तो अपनी जौनसारी बोली में कहते हैँ -ये लगा भौ ठोऊड़ा सुला विस्वा सुला विस्वा. मूलतः इस युद्ध कौशल एवं पराक्रम के भाव भले आज मनोरंजन के हो किंतु मुझे ऐसा लगता है कि यह क्षेत्र बाहरी आक्रांताओं की निकटता में रहा है फलतः जनजातीय समाज अपनी सुरक्षा आदि के अनुरूप अपनी पारम्परिक नींव तैयार करता था.

निष्कर्षत: ऐतिहासिक संदर्भ तब की जटिलताओं एवं भौगोलिक विषमताओं का जो भी रहा हो किंतु जौनसारी समाज ने तीज़ त्योहार एवं पर्वों के माध्यम से अपनी जीवंतता भौतिकवादी परिवर्तन के दौर में रखी हुई है. ठाणा डांडें की लगभग डेड़ किमी मीटर लम्बी चौड़ी थात में बाँझ- बुरांस एवं देवदार के बीच में सपाट थात में कई सौ गाड़ियां एवं हजारों लोगों की भीड़ जो हिमाचल, बावर, रवांईं, जौनसार जौनपुर एवं गढ़वाल आदि क्षेत्रों की उमंगता उत्साह आज के पलायनवादी स्वरूप में एक बड़ी आश एवं उम्मीद जगाती है.

जौनसारी संस्कृति में सांस्कृतिक जीवंतता वाद्य यंत्रों की विरासत से है. गनियात समाप्ति पर वनगाँव के ढोलियों/बाजगियों को बड़ें मान सम्मान से विदाई दी जा रही थी. इस भावनात्मक दृश्य में मुझे आकर्षित किया. बिना इनके यहां का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जीवंतता सम्भव नहीं है. यमुना घाटी की जौनसारी लोक संस्कृति में लोक नृत्यों में सामूहिकवाद एवं शानदार सांस्कृतिक अनुशासन दिखता है, यही इस मौलिक संस्कृति की मूल विशेषता है. जो अन्य संस्कृतियों हेतु प्रेरणादायी भी है.

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